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Poetry

Mita Roy

 देश की पहली महिला कार्टूनिस्ट (राजनैतिक) मीता रॉय एक अच्छी लेखिका और कवियत्री भी हैं। प्रस्तुत है उनकी एक नज़्म -यादों के बादल।

निर्झर झरते शब्द
मन के भीतर
सन्नाटा पसरा हुआ
होठों पर
मौन खेल चल रहा
अन्तस् बाहर भीतर 
मीता रॉय

12 जनवरी 2017

सरहदें खड़ी हो जाती हैं,
झाड़ियों की तरह उग जाती हैं,
कही भी,
कभी भी,
ज़मीन पर ही नहीं
घरों के अंदर भी,
दिलों के भीतर भी I
मीता रॉय 
11.01.17

डर है मुझे
कि मेरे ज़ेहन में
जाले हैं
जालों में तुम होहमारी दास्तां है।
बुहारती तक नहीं जिनको मैं
ग़र्द भी नही जमने देती।

डर है मुझे
कि मैं कलम उठाऊँ
तो कही तुम उतर न आओं
ज़ेहन से काग़ज़ पर
हर हर्फ़ चमकने लगे
जुगनुओं के मानिंद
मेरी सियाह रातों में

डर है मुझे
कि तुम्हें ही न बना दूं
शाहकार कहीं
ये तुम्हारें यादों की मिल्कियत
तब्दील न हो जाएं
तशहीर में कहीं
पढ़ ले दुनिया
और मैं रह जाऊं
लुटी लुटी सी
कि फिर मेरे पास क्या बचेगा

डर है मुझे
कि कही किसी रोज़
ग़र्द न जम जाएँ
उन जालों में
जिनमें तुम हो
हमारी दास्ताँ है।
– मीता रॉय
14 .02.17

उमड़ घुमड़ रहे हैं साँझ से यादों के बादल आज फिर रात भर जमकर बरसात होगी।
नींद न जाने कब से हड़ताल पर है आज फिर भरपूर रतजगाई होगी।
हौले हौले कटेगी रात तग़ाफ़ुल के साथ सिर्फ़ तारीख़ ही बदलेगी जब अलसाई सुबह की दस्तक होगी ।
कोहरे में घिरी तेरी यादों ने खूबसूरत पहाड़ों पर रात बेसाख़्ता ही कोई धुन गुनगुनाई होगी ।
तुम्हारी ख़ामोशियों ने मचाया है शोर बहुत अब तो खुद की खुद से ही गुफ़तगूं होगी।
दर्द की चाशनी में पक रहा है पीला-पीला चाँद मिरी रातों में भला कितनी रौशनी होगी ?
तुमसे तो अच्छी ये तन्हाईयाँ हैं ज़िन्दगी जवानी से ही इनकी आग़ोश में होगी।
सांसों का मिरी उफ़ान थम चुका है पहले बीमारी फिर मौत मेरी तलाश में होगी।
आखिरी धड़कन भी डूब रही सबको ख़बर है मगर कानों तक उसके ये बात न पहुँची होगी ।
दिल का बेशुमार दर्द अब छलकनें लगा है जबकि पैबन्द लगा-लगा कर करीने से रखी होंगी।
ये दिले-तबाही का मंज़र भी देख लो चाहने वालों अब किसी और से यारी -न -दोस्ती होगी ।
सदियों बाद मिरी तन्हाइयों ने क़लम उठाई है देखना फिर वहीं करिश्माई बातें होंगी ।
तुम तो छोड़ गए तन्हाइयों के साथ मुझे तुमसे अब क्या ख़ाक मुलाक़ात होगी।
मीता रॉय